ग़ज़ल
नवल किसोरी भोरी केसर ते गोरी
नवल किसोरी भोरी केसर ते गोरी, छैल-होरी में रही है मद जोबन के छकि कै ।चंपे कैसौ ओज, अति उन्नत उरोज पीन,जाके बोझ खीन कटि जाति है लचकि कै ॥लाल है चलायौ, ललचाइ ललना कों देखि,उघरारौ उर, उरबसी ओर तकि कै ।’सेनापति’ सोभा कौ समूह कैसे कह्यौ जात,रह्यौ हौ गुलाल अनुराग सों झलकि कै ॥
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