ग़ज़ल
इश्क़ की गर्मी-ए-जज़्बात किसे पेश करूँ
इश्क़ की गर्मी-ए-जज़्बात किसे पेश करूँये सुलग़ते हुए दिन-रात किसे पेश करूँ
हुस्न और हुस्न का हर नाज़ है पर्दे में अभीअपनी नज़रों की शिकायात किसे पेश करूँ
तेरी आवाज़ के जादू ने जगाया है जिन्हेंवो तस्सव्वुर, वो ख़यालात किसे पेश करूँ
ऐ मेरी जान-ए-ग़ज़ल, ऐ मेरी ईमान-ए-ग़ज़लअब सिवा तेरे ये नग़मात किसे पेश करूँ
कोई हमराज़ तो पाऊँ कोई हमदम तो मिलेदिल की धड़कन के इशारात किसे पेश करूँ
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