ग़ज़ल
आज
साथियो! मैंने बरसों तुम्हारे लिएचाँद, तारों, बहारों के सपने बुनेहुस्न और इश्क़ के गीत गाता रहाआरज़ूओं के ऐवां सजाता रहामैं तुम्हारा मुगन्नी, तुम्हारे लिएजब भी आया नए गीत लाता रहाआज लेकिन मिरे दामने-चाक मेंगर्दे-राहे-सफ़र के सिवा कुछ नहींमेरे बरबत के सीने में नग्मों का दम घुट गया हैतानें चीखों के अम्बार में दब गई हैंऔर गीतों के सुर हिचकियाँ बन गए हैंमैं तुम्हारा मुगन्नी हूँ, नग्मा नहीं हूँऔर नग्मे की तख्लाक का साज़ों-सामांसाथियों! आज तुमने भसम कर दिया हैऔर मैं, अपना टूटा हुआ साज़ थामेसर्द लाशों के अम्बार को तक रहा हूँमेरे चारों तरफ मौत की वहशतें नाचती हैंऔर इंसान की हैवानियत जाग उठी हैबर्बरियत के खूंख्वार अफ़रीतअपने नापाक जबड़ो को खोलेखून पी-पी के गुर्रा रहे हैंबच्चे मांओं की गोद में सहमे हुए हैंइस्मतें सर-बरह् ना परीशान हैंहर तरफ़ शोरे-आहो-बुका हैऔर मैं इस तबाही के तूफ़ान मेंआग और खून के हैजान मैंसरनिगूं और शिकस्ता मकानों के मलबे से पुर रास्तों परअपने नग्मों की झोली पसारेदर-ब-दर फिर रहा हूँ-मुझको अम्न और तहजीब की भीक दोमेरे गीतों की लय, मेरे सुर, मेरी नैमेरे मजरुह होंटो को फिर सौंप दोसाथियों ! मैंने बरसों तुम्हारे लिएइन्किलाब और बग़ावत के नगमे अलापेअजनबी राज के ज़ुल्म की छाओं मेंसरफ़रोशी के ख्वाबीदा ज़ज्बे उभारेइस सुबह की राह देखीजिसमें इस मुल्क की रूह आज़ाद होआज जंज़ीरे-महकूमियत कट चुकी हैऔर इस मुल्क के बह् रो-बर, बामो-दरअजनबी कौम के ज़ुल्मत-अफशां फरेरे की मनहूसछाओं से आज़ाद हैंखेत सोना उगलने को बेचैन हैंवादियां लहलहाने को बेताब हैंकोहसारों के सीने में हैजान हैसंग और खिश्त बेख्वाब-ओ-बेदार हैंइनकी आँखों में ता’मीर के ख्वाब हैंइनके ख्वाबों को तक्मील का रुख दोमुल्क की वादियां,घाटियों,औरतें, बच्चियां-हाथ फैलाए खैरात की मुन्तिज़र हैंइनको अमन और तहज़ीब की भीक दोमांओं को उनके होंटों की शादाबियांनन्हें बच्चों को उनकी ख़ुशी बख्श दोमुल्क की रूह को ज़िन्दगी बख्श दोमुझको मेरा हुनर, मेरी लै बख्श दोमेरे सुर बख्श दो, मेरी नै बख्श दोआज सारी फ़जा है भिकारीऔर मैं इस भिकारी फ़जा मेंअपने नगमों की झोली पसरेदर-ब–दर फिर रहा हूंमुझको फिर मेरा खोया हुआ साज़ दोमैं तुम्हारा मुगन्नी, तुम्हारे लिएजब भी आया नए गीत लाता रहूंगा...................................................................
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