ग़ज़ल
इसी दोराहे पर
अब न इन ऊंचे मकानों में क़दम रक्खूंगामैंने इक बार ये पहले भी क़सम खाई थीअपनी नादार मोहब्बत की शिकस्तों के तुफ़ैलज़िन्दगी पहले भी शरमाई थी, झुंझलाई थी
और ये अहद किया था कि ब-ई-हाले-तबाहअब कभी प्यार भरे गीत नहीं गाऊंगाकिसी चिलमन ने पुकारा भी तो बढ़ जाऊँगाकोई दरवाज़ा खुला भी तो पलट आऊंगा
फिर तिरे कांपते होंटों की फ़ुन्सूकारहंसीजाल बुनने लगी, बुनती रही, बुनती ही रहीमैं खिंचा तुझसे, मगर तू मिरी राहों के लिएफूल चुनती रही, चुनती रही, चुनती ही रही
बर्फ़ बरसाई मिरे ज़ेहनो-तसव्वुर ने मगरदिल में इक शोला-ए-बेनाम-सा लहरा ही गयातेरी चुपचाप निगाहों को सुलगते पाकरमेरी बेज़ार तबीयत को भी प्यार आ ही गया
अपनी बदली हुई नज़रों के तकाज़े न छुपामैं इस अंदाज़ का मफ़हूम समझ सकता हूँतेरे ज़रकार दरीचों को बुलंदी की क़समअपने इकदाम का मकसूम समझ सकता हूँ
अब न इन ऊँचे मकानों में क़दम रक्खूंगामैंने इक बार ये पहले भी क़सम खाई थीइसी सर्माया-ओ-इफ़लास के दोराहे परज़िन्दगी पहले भी शरमाई थी, झुंझलाई थी
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