ग़ज़ल

अब अगर हमसे ख़ुदाई भी खफ़ा हो जाए

साहिर लुधियानवी · सब कलाम देखें
अब अगर हमसे ख़ुदाई भी खफ़ा हो जाएगैर-मुमकिन है कि दिल दिल से जुदा हो जाएजिस्म मिट जाए कि अब जान फ़ना हो जाएगैर-मुमकिन है...
जिस घड़ी मुझको पुकारेंगी तुम्हारी बाँहेंरोक पाएँगी न सहरा की सुलगती राहेंचाहे हर साँस झुलसने की सज़ा हो जाएगैर-मुमकिन है...
लाख ज़ंजीरों में जकड़ें ये ज़माने वालेतोड़ कर बन्द निकल आएँगे आने वालेशर्त इतनी है कि तू जलवा-नुमाँ हो जाएगैर-मुमकिन है...
ज़लज़ले आएँ गरज़दार घटाएँ घेरेंखंदकें राह में हों तेज़ हवाएँ घेरेंचाहे दुनिया में क़यामत ही बपा हो जाएगैर-मुमकिन है...
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