ग़ज़ल

इस तरफ से गुज़रे थे काफ़िले बहारों के

साहिर लुधियानवी · सब कलाम देखें
इस तरफ से गुज़रे थे काफ़िले बहारों केआज तक सुलगते हैं ज़ख्म रहगुज़ारों के
खल्वतों के शैदाई खल्वतों में खुलते हैंहम से पूछ कर देखो राज़ पर्दादारों के
पहले हंस के मिलते हैं फिर नज़र चुराते हैंआश्ना-सिफ़त हैं लोग अजनबी दियारों के
तुमने सिर्फ चाहा है हमने छू के देखे हैंपैरहन घटाओं के, जिस्म बर्क-पारों के
शगले-मयपरस्ती गो जश्ने-नामुरादी हैयूँ भी कट गए कुछ दिन तेरे सोगवारों के
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