ग़ज़ल
बन बन के वो आईना ज़रा देख रहे हैं
बन बन के वो आईना ज़रा देख रहे हैंआग़ाज-ए-जवानी की अदा देख रहे हैं
बन बन के क़ज़ा खेल रही है मिरे सर परवो आईने में अपनी अदा देख रहे हैं
आए तो हैं पीते नहीं नासेह अभी साक़ीमहफ़िल का तिरी रंग ज़रा देख रहे हैं
देखा नहीं हम ने अभी दुनिया का बदलनाबदली है ज़माने की हवा देख रहे हैं
अब ख़ार नहीं ‘रियाज़’ आँख में है आलम-ए-हस्तीहम दूसरे आलम की फ़ज़ा देख रहे हैं
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh