ग़ज़ल

ये ज़ौक़-ए-अदब मस्त-ए-मय-ए-होश-रूबा का

रियाज़ ख़ैराबादी · सब कलाम देखें
ये ज़ौक़-ए-अदब मस्त-ए-मय-ए-होष-रूबा कालग्जिश है क़लम को जो लिखा नाम ख़ुदा का
मय-ख़ाने को नाकाम फिरा तूर से तो क्यानज़्ज़ारा रहा मौज-ए-मय-ए-होश-रूबा का
जन्नत की ज़रा अहल-ए-जहन्नुम को भी हो क़द्रझोंका इधर आ जाए कोई सर्द हवा का
क्या तुझ से तिरे मस्त ने माँगा मिरे अल्लाहहर मौज-ए-शराब उठ के बनी हाथ दुआ का
जो कुछ हो मिरा हश्र मैं दीवाना हूँ तेरामहशर में मुझे होश जज़ा का न सज़ा का
जाना था कि आना था जवानी का इलाहीसैलाब की थी मौज कि झोंका था हवा का
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