ग़ज़ल

कल क़यामत है क़यामत के सिवा क्या होगा

रियाज़ ख़ैराबादी · सब कलाम देखें
कल क़यामत है क़यामत के सिवा क्या होगाऐ मैं कुर्बान वफ़ा वादा-ए-फ़र्दा क्या होगा
हश्र के रोज़ भी क्या ख़ून-ए-तमन्ना होगासामने आएँगे या आज भी पर्दा होगा
तू बता दे हमें सदक़े तिरे ऐ शान-ए-करमहम गुनहगार हैं क्या हश्र हमारा होगा
ऐसी ले दे हुई आ कर कि इलाही तौबाहम समझते थे कि महशर में तमाशा होगा
पी के आया अरक़-ए-शर्म जबीं पर जो कभीचेहरे पर बादा-कशो नूर बरसता होगा
शर्म-ए-इस्याँ से नहीं उठती हैं पलकेंहम गुनहगार से क्या हश्र में पर्दा होगा
काबा सुनते हैं कि घर है बड़े दाता का ‘रियाज़’ज़िंदगी है तो फ़क़ीरों का भी फेरा होगा
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