ग़ज़ल
वो पूछते हैं शौक़ तुझे है विसाल का
वो पूछते हैं शौक़ तुझे है विसाल कामुँह चूम लूँ जवाब तो ये है सवाल का
सौ नाज़ से जो आए क़यामत तो कुछ नहींअंदाज़ और है तिरी मस्ताना चाल का
मुमकिन नहीं कि सुन के हो तुम्हें शगुफ़्तगीपूछो न हाल तुम किसी आशुफ़्ता-हाल का
क़िस्मत मिरी वो आए मिरा दिल ख़रीदनेहोता है मोल आज तो मुफ़लिस के माल का
रहना ‘रियाज़’ साए से भी उस के दूर दूरदुश्मन ये आसमान है अहल-ए-कमाल का
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