ग़ज़ल

ये काफ़िर बुत जिन्हें दावा है दुनिया में ख़ुदाई का

रियाज़ ख़ैराबादी · सब कलाम देखें
ये काफ़िर बुत जिन्हें दावा है दुनिया में ख़ुदाई कामिलें महशर में मुझ आसी का सदक़ा किबरियाई का
ये मुझ से सख़्त-जाँ पर शौक़ ख़ंजर आज़माई काख़ुदा-हाफ़िज़ मिरे क़ातिल तिरी नाज़ुक कलाई का
तुम अच्छे ग़ैर अच्छा ग़ैर की तक़दीर भी अच्छीये आख़िर ज़िक्र क्यूँ है मेरी क़िस्मत की बुराई का
वो क्या सोएँगे ग़ाफ़िल हो के शब भर मिरे पहलू मेंउन्हें ये फ़िक्ऱ है निकले कोई पहलू लड़ाई का
इशारे पर तिरे चल कर ये लाए रंग मुश्किल हैअभी मोहताज है ख़ंजर तिरे दस्त-ए-हिनाई का
कोई क्या जन्नत में कि उस ने तूल खींचा हैक़यामत पर भी साया पड़ गया रोज़-ए-जुदाई का
बनाई क्या बुरी गत मय-कदे में बादा-नोशों ने‘रियाज़’ आए थे कल जामा पहन कर पारसाई का
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh