ग़ज़ल

मकाँ देखे मकीं देखे ला-मकाँ देखा

रियाज़ ख़ैराबादी · सब कलाम देखें
मकाँ देखे मकीं देखे ला-मकाँ देखाकहाँ कहाँ तुझे ढूँढा कहाँ कहाँ देखा
झुका झुका है तो हाँ गिर पडे़ मिरे सर परयही न यास से था सू-ए-आसमाँ आसमाँ
बहुत से रिंद भी देखे बहुत से ज़ाहिद भीइन्हें तो पीर हमेशा उन्हें जवाँ देखा
अब आरज़ुएँ बर आईं कि ख़ाक में मिल जाएँख़ुदा ने दिन ये दिखाया उन्हें जवाँ देखा
ये जानते हैं दिल ख़ाक हो गया जल करन आग देखी न उठते हुए धुआँ देखा
क़फ़स में रह के सितम तेरे देख लें सय्यादचमन में रह के बहुत लुत्फ़-ए-बाग़बाँ देखा
‘रियाज़’ ख़ाक-ए-दर-ए-मय-कदा था जीते जीफ़ना के बाद उसे ख़ुल्द-ए-आशियाँ देखा
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