ग़ज़ल
जफ़ा में नाम निकालो न आसमाँ की तरह
जफ़ा में नाम निकालो न आसमाँ की तरहखुलेंगी लाख ज़बानें मिरी ज़बाँ की तरह
ये किस की साया-ए-दीवार ने मुझे पीसाये कौन टूट पड़ा मुझ पे आसमाँ की तरह
रह-ए-हयात कटी इस तरह कि उठ उठ करमैं बैठ बैठ गया गर्द-ए-कारवाँ की तरह
शरीक-ए-दर्द तो क्या बाइस-ए-अज़ीयत हैंवो लोग जिन से तअल्लुक़ था जिस्म ओ जाँ की तरह
मुझे शबाब ने मारा बला-ए-जाँ हो करबहार आई मिरे बाग़ में ख़िजाँ की तरह
तिरी उठान तरक़्क़ी करे क़यामत कीतिरा शबाब बढ़े उम्र-ए-जावेदाँ की तरह
‘रियाज़’ मौत है इस शर्त से हमें मंज़ूरज़मीं सताए न मरने पर आसमाँ की तरह
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