ग़ज़ल
आईना देखते ही वो दीवाना हो गया
आईना देखते ही वो दीवाना हो गयादेखा किसे कि शम्अ से परवाना हो गया
गुल कर के शम्अ सोए थे हम ना-मुराद आजरौशन किसी के आने से काशाना हो गया
मुँह चूम लूँ ये किस ने कहा मुझ को देख करदीवाना था ही और भी दीवाना हो गया
तोड़ी थी जिस से तौबा किसी ने हज़ार बारअफ़्सोस नज़्र-ए-तौबा वो पैमाना हो गया
मय तौबा बन के आई थी लब तक ऐ ‘रियाज़’लबरेज़ अपनी उम्र का पैमाना हो गया
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