ग़ज़ल
कोई मुँह चूम लेगा इस नहीं पर
कोई मुँह चूम लेगा इस नहीं परशिकन रह जाएगी यूँही जबीं पर
उड़ाए फिरती है उन को जवानीक़दम पड़ता नहीं उन का ज़मीं पर
धरी रह जाएगी यूँही शब-ए-वस्लनहीं लब पर शिकन उन की ज़बीं पर
मुझे है ख़ून का दावा मुझे हैउन्हीं पर दावर-ए-महशर उन्हीं पर
‘रियाज़’ अच्छे मुसलमाँ आप भी हैंकि दिल आया भी तो काफ़िर हसीं पर
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