ग़ज़ल

सलामत मय-कदा या रब सलामत पीर-ए-मय-ख़ाना

रियाज़ ख़ैराबादी · सब कलाम देखें
सलामत मय-कदा या रब सलामत पीर-ए-मय-ख़ानाहरम में हूँ मिरी आँखों में है तस्वीर-ए-मय-ख़ाना
तुझे जाना भी है जन्नत में ऐ वाइज़ जवाँ हो करजो आया है तो देखे जा ज़रा तासीर-ए-मय-ख़ाना
रह-ए-दैर-ओ-हरम जो कोई भूला यहीं पहुँचान भूला रास्ता कोई कभी रहगीर-ए-मय ख़ाना
कहें हम क्या हमारा मय-कदा वाबस्ता है किस सेमिली है अर्श की ज़ंजीर से ज़ंजीर-ए-मय-ख़ाना
‘रियाज़’ इस मय-कदे में भी शरफ़ है कुछ सियादत कोनहीं हम पीर-ए-मय-ख़ाना मगर हैं मीर-ए-मय-ख़ाना
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