ग़ज़ल
जी उठे हश्र में फिर जी से गुज़रने वाले
जी उठे हश्र में फिर जी से गुज़रने वालेयाँ भी पैदा हुए फिर आप पर मरने वाले
है उदासी शब-ए-मातम ही सुहानी कैसीछाँव में तारों की निकले हैं सँवरने वाले
हम तो समझते थे कि दुश्मन पे उठाया ख़ंजरतुम ने जाना कि हमीं तुम पे हैं मरने वाले
उम्र क्या है अभी कम-सिन हैं न तन्हा लेटेंसो रहें पास मिरे ख़्वाब में डरने वाले
नज़अ में हश्र के वादे ने ये तस्कीं बख़्शीचैन से सो रहे मुँह ढाँप के मरने वाले
सब्र की मेरे मुझे दाद ज़रा दे देनाओ मिरे हश्र के दिन फै़सला करने वाले
क्या मज़ा देती है बिजली की चमक मुझ को ‘रियाज़’मुझ से लिपटे हैं मिरे नाम से डरने वाले
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