ग़ज़ल
वो कौन है दुनिया में जिसे ग़म नहीं होता
वो कौन है दुनिया में जिसे ग़म नहीं होताकिस घर में ख़ुशी होती है मातम नहीं होता
तुम जा के चमन में गुल-ओ-बुलबुल को तो देखोक्या लुत्फ़ तह-ए-चादर-ए-शबनम नहीं होता
क्या सुर्मा भरी आँखों से आँसू नहीं गिरतेक्या मेहंदी लगे हाथों से मातम नहीं होता
कुछ और ही होती हैं बिगड़ने की अदाएँबनने में सँवरने में ये आलम नहीं होता
मिटते हुए देखी है अजब हुस्न की तस्वीरअब कोई मरे मुझ को ज़रा ग़म नहीं होता
कुछ भी हो ‘रियाज़’ आँख में आँसू नहीं आतेमुझ को तो किसी बात का अब ग़म नहीं होता
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