ग़ज़ल

दिल-जलों से दिल-लगी अच्छी नहीं

रियाज़ ख़ैराबादी · सब कलाम देखें
दिल-जलों से दिल-लगी अच्छी नहींरोने वालों से हँसी अच्छी नहीं
मुँह बनाता है बुरा क्यूँ वक़्त-ए-वाज़आज वाइज़ तू ने पी अच्छी नहीं
बुत-कदे से मय-कदा अच्छा मिराबे-ख़ुदी अच्छी ख़ुदी अच्छी नहीं
मुफ़लिसों की ज़िंदगी का ज़िक्र क्यामुफ़लिसी की मौत भी अच्छी नहीं
इक हसीं हो दिल के बहलाने को रोज़रोज़ की ये दिल-लगी अच्छी नहीं
ज़र्रा ज़र्रा आफ़्ताब-ए-हश्र हैहश्र अच्छा वो गली अच्छी नहीं
अहल-ए-महशर से न उलझो तुम ‘रियाज़’हश्र में दीवानगी अच्छी नहीं
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