ग़ज़ल
अबिगत नाथ निरंजन देवा
अबिगत नाथ निरंजन देवा।मैं का जांनूं तुम्हारी सेवा।। टेक।।बांधू न बंधन छांऊँ न छाया, तुमहीं सेऊँ निरंजन राया।।१।।चरन पताल सीस असमांना, सो ठाकुर कैसैं संपटि समांना।।२।।सिव सनिकादिक अंत न पाया, खोजत ब्रह्मा जनम गवाया।।३।।तोडूँ न पाती पूजौं न देवा, सहज समाधि करौं हरि सेवा।।४।।नख प्रसेद जाकै सुरसुरी धारा, रोमावली अठारह भारा।।५।।चारि बेद जाकै सुमृत सासा, भगति हेत गावै रैदासा।।६।।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.