ग़ज़ल
जा दिनतें निरख्यौ नँद-नंदन
जा दिनतें निरख्यौ नँद-नंदन, कानि तजी घर बन्धन छूट्यो॥चारु बिलोकनिकी निसि मार, सँभार गयी मन मारने लूट्यो॥सागरकौं सरिता जिमि धावति रोकि रहे कुलकौ पुल टूट्यो।मत्त भयो मन संग फिरै, रसखानि सुरूप सुधा-रस घूट्यो॥
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