ग़ज़ल
कान्ह भये बस बाँसुरी के
कान्ह भये बस बाँसुरी के, अब कौन सखी हमको चहिहै।निसि द्यौस रहे यह आस लगी, यह सौतिन सांसत को सहिहै।जिन मोहि लियो मनमोहन को, 'रसखानि' सु क्यों न हमैं दहिहै।मिलि आवो सबै कहुं भाग चलैं, अब तो ब्रज में बाँसुरी रहिहै।
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