ग़ज़ल
आगु गई हुति भोर ही हों रसखानि
आगु गई हुति भोर ही हों रसखानि,:::रई बहि नंद के भौनंहि।बाको जियों जुगल लाख करोर जसोमति,:::को सुख जात कहमों नहिं।
तेल लगाई लगाई के अजन भौहिं बनाई:::बनाई डिठौनहिं।डालि हमेलिन हार निहारत बारात ज्यों,:::चुचकारत छोनहिं।
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