ग़ज़ल

गाई दहाई न या पे कहूँ

रसखान · सब कलाम देखें
गाई दहाई न या पे कहूँ,::नकहूँ यह मेरी गरी, निकस्थौ है।धीर समीर कालिंदी के तीर,::टूखरयो रहे आजु ही डीठि परयो है।
जा रसखानि विलोकत ही सरसा ढरि,::रांग सो आग दरयो है।गाइन घेरत हेरत सो पंट फेरत टेरत,::आनी अरयो है।
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