ग़ज़ल

पुष्प विकास

रामनरेश त्रिपाठी · सब कलाम देखें
एक दिन मोहन प्रभात ही पधारे, उन्हेंदेख फूल उठे हाथ-पांव उपवन के ।खोल-खोल द्वार फूल घर से निकल आए,देख के लुटाए निज कोष सुबरन के ।।
वैसी छवि और कहीं खोजने सुगंध उडी,पाई न, लजा के रही बाहर भवन के ।मारे अचरज के खुले थे सो खुले ही रहे,तब से मुंदे न मुख चकित सुमन के ।।
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