ग़ज़ल

अस्तोदय की वीणा

रामनरेश त्रिपाठी · सब कलाम देखें
बाजे अस्तोदय की वीणा--क्षण-क्षण गगनांगण में रे।::हुआ प्रभात छिप गए तारे,::संध्या हुई भानु भी हारे,यह उत्थान पतन है व्यापक प्रति कण-कण में रे॥::ह्रास-विकास विलोक इंदु में,::बिंदु सिन्धु में सिन्धु बिंदु में,कुछ भी है थिर नहीं जगत के संघर्षण में रे॥::ऐसी ही गति तेरी होगी,::निश्चित है क्यों देरी होगी,गाफ़िल तू क्यों है विनाश के आकर्षण में रे॥::निश्चय करके फिर न ठहर तू,::तन रहते प्रण पूरण कर तू,विजयी बनकर क्यों न रहे तू जीवन-रण में रे?
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