ग़ज़ल
दीन चहैं करतार जिन्हें सुख
दीन चहैं करतार जिन्हें सुख, सो तौ ’रहीम’ टरै नहिं टारे।उद्यम पौरुष कीने बिना, धन आवत आपुहिं हाथ पसारे॥दैव हँसै अपनी अपनी, बिधि के परपंच न जात बिचारे।बेटा भयो बसुदेव के धाम औ दुंदुभि बाजत नंद के द्वारे॥
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