ग़ज़ल

बरवै भक्तिपरक

रहीम · सब कलाम देखें
बन्‍दौ विघन-बिनासन, ऋधि-सिधि-ईस ।निर्मल बुद्धि-प्रकासन, सिसु ससि सीस ।।1।।
सुमिरौ मन दृढ़ करकै, नन्‍दकुमार ।जे वृषभान-कुँवरि कै प्रान-अधार ।।2।।
भजहु चराचर-नायक, सूरज देव ।दीन जनन सुखदायक, तारन एव ।।3।।
ध्‍यावौ सोच-बिमोचन, गिरिजा-ईस ।नागर भरन त्रिलोचन, सुरसरि-सीस ।।4।।
ध्‍यावौं विपद-विदारन सुअन-समीर ।खल दानव वनजारन प्रिय रघुवीर ।।5।।
पुन पुन बन्‍दौ गुरु के, पद जलजात ।जिहि प्रताप तैं मन के तिमिर बिलात ।।6।।
करत घुम‍ड़ घन-घुरवा, मुरवा रोर ।लगि रह विकसि अँकुरवा, नन्‍दकिसोर ।।7।।
बरसत मेघ चहूँ दिसि, मूसरधार ।सावन आवन कीजत, नन्‍दकुमार ।।8।।
अजौं न आये सुधि के, सखि घनश्‍याम ।राख लिये कहुँ बसि कै, काहू बाम ।।9।।
कबलौं रहिहै सजनी, मन में धीर ।सावन हूँ नहिं आवन, कित बलबीर ।।10।।
घन घुमड़े चहुँ ओरन, चमकत बीज ।पिय प्‍यारी मिलि झूलत, सावन तीज ।।11।।
पीव पीव कहि चातक, सठ अधरात ।करत बिरहिनी तिय के, हित उतपात ।।12।।
सावन आवन कहिगे, स्‍याम सुजान ।अजहुँ न आये सजनी, तरफत प्रान ।।13।।
मोहन लेउ मया करि, मो सुधि आय ।तुम बिन मीत अहर-निसि, तरफत जाय ।।14।।
बढ़त जात चित दिन-दिन, चौगुन चाव ।मनमोहन तैं मिलवौ राखि क दॉंव ।।15।।
मनमोहन बिन देखे, दिन न सुहाय ।गुन न भूलिहौं सजनी, तनक मिलाय ।।16।।
उमिड़-उमिड़ घन घुमड़े दिसि बिदिसान ।सावन दिन मनभावन, करत पयान।।17।।
समुझत सुमुखि सयानी, बादर झूम ।बिरहिन के हिय भभकत तिनकी धूम ।।18।।
उलहे नये अँकुरवा, बिन बलबीर ।मानहु मदन महिप के बिन पर तीर ।।19।।
सुगमहि गातहि का रन जारत देह ।अगम महा अति पान सुघर सनेह ।।20।।
मनमोहन तुव मूरति, बेरिझवार ।बिन पयान मुहि बनिहै, सकल विचार ।।21।।
झूमि झूमि चहुँ ओरन, बरसत मेह ।त्‍यों त्‍यों पिय बिन सजनी, तरफत देह ।।22।।
झूँठी झूँठी सौंहैं हरि नित खात ।फिर जब मिलत मरू के, उतर बतात ।।23।।
डोलत त्रिबिध मरुतवा, सुखद सुढार ।हरि बिन लागत सजनी, जिमि तरवार ।।24।।
कहियो पथिक सँदेसवा, गहि कै पाय ।मोहन तुम बिन तनकहु, रह्यो न जाय ।12511
जब ते आयौ सजनी, मास असाढ़ ।जानी सखि वा तिय के, हिय की गाढ़ ।।26।।
मनमोहन बिन तिय के, हिय दुख बाढ़ ।आयौ नन्‍द-ढोठनवा, लगत असाढ़ ।।271।
वेद पुरानबखानत, अधम-उधार ।केहि कारन करुनानिधि, करत विचार ।।28।।
लगत असाढ़ कहत हो, चलन किसोर ।घन घुमड़े चहुँ ओरन, नाचत मोर ।।29।।
लखि पावस ऋतु सजनी, पिय परदेस ।गहन लग्‍यौ अबलनि पै, धनुष सुरेस ।।30।।
बिरह बढ्यौ सखि अंगन, बढ़यौ चबाव ।कर्यौ निठुर नन्‍दन्‍दन, कौन कुदाव? ।।31।।
भज्‍यो किते न जनम भरि, कितनी जाग ।संग रहत या तन की, छाँही भाग ।।32।।
भज रे मन नंदनन्‍दन, बिपति बिदार ।गोपी जन-मन-रंजन, परम उदार ।।33।।
जदपि बसत है सजनी, लाखन लोग ।हरि बिन कित यह चित को, सुख संजोग ।।34।।
जदपि भई जल-पूरित, छितव सुआस ।स्‍वाति बूँद बिन चातक, मरत पिआस ।।35।।
देखन ही को निस दिन, तरफत देह ।यही होत मधुसूदन, पूरन नेह? ।।36।।
कब ते देखत सजनी, बरसत मेह ।गनत न चढ़े अटन पै, सने सनेह ।।37।।
बिरह बिथा ते लखियत, मरिबौ भूरि ।जौ नहिं मिलिहै मोहन, जीवन मूरि ।।38।।
ऊधो भलो न कहनौ, कछु पर पूठि ।साँचे ते भे झूठे, साँची झूठि ।।39।।
भादों निस अँधिअरिया घर अँधिआर ।बिसर्यो सुघर बटोही, शिव आगार ।।40।।
हौं लखिहौं री सजनी, चौथ-मयंक ।दखौं केहि विधि हरि सों लगै कलंक ।।41।।
इन बातन कछु होत न कहो हजार ।सब ही तैं हँसि बोलत, नंद-कुमार ।।42।।
कहा छलत हो ऊधो, दै परतीति ।सपनेहू नहिं बिसरै, मोहन-मीति ।।43।।
बन उपवन गिरि सरिता, जिती कठोर ।लगत दहे से बिछुरे, नंदकिसोर ।।44।।
भलि भलि दरसन दीनेहु, सब निसि-टारि ।कैसे आवन कीनेहु, हौं बलिहारि ।।45।।
आदिहि ते सब छुटि गा, जग ब्‍यौहार ।ऊधो अब न तिनौ भरि, रही उधार ।।46।।
घेर रह्यौ दिन रतियाँ, बिरह बलाय ।मोहन की वह बतियाँ, ऊधो हाय! ।।47।।
नर नारी मतवारी, अचरज नाहिं ।होत विटप हू नाँगे फागुन माँहि ।।48।।
सहज हँसोई बातें, होत चबाइ ।मोहन को तनि सजनी, दै समुझाइ ।।49।।
ज्‍यों चौरासी लख में, मानुष देह ।
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