ग़ज़ल

संस्कृत श्लोक

रहीम · सब कलाम देखें
(श्‍लोक)
आनीता नटवन्‍मया तब पुर; श्रीकृष्‍ण! या भूमिका ।व्‍योमाकाशखखांबराब्धिवसवस्‍त्‍वत्‍प्रीतयेऽद्यावधि ।।प्रीतस्‍त्‍वं यदि चेन्निरीक्ष्‍य भगवन् स्‍वप्रार्थित देहि मे ।नोचेद् ब्रूहि कदापि मानय पुरस्‍त्‍वेतादृशीं भूमिकाम् ।।1।।
(अर्थ)
हे श्रीकृष्‍ण! आपके प्रीत्‍यर्थ आज तक मैं नट की चाल पर आपके सामने लाया जाने से चैरासी लाख रूप धारण करता रहा । हे परमेश्‍वर! यदि आप इसे (दृश्‍य) देख कर प्रसन्‍न हुए हों तो जो मैं माँगता हूँ उसे दीजिए और नहीं प्रसन्‍न हों तो ऐसी आज्ञा दीजिए कि मैं फिर कभी ऐसे स्‍वाँग धारण कर इस पृथ्‍वी पर न लाया जाऊँ।
(श्‍लोक)
कबहुँक खग मृग मीन कबहुँ मर्कटतनु धरि कै ।कबहुँक सुर-नर-असुर-नाग-मय आकृति करि कै ।।नटवत् लख चौरासि स्‍वॉंग धरि धरि मैं आयो ।हे त्रिभुवन नाथ! रीझ को कछू न पायो ।।जो हो प्रसन्‍न तो देहु अब मुकति दान माँगहु बिहँस ।जो पै उदास तो कहहु इम मत धरु रे नर स्‍वाँग अस ।।रिझवन हित श्रीकृष्‍ण, स्‍वाँग मैं बहु बिध लायो ।पुर तुम्‍हार है अवनि अहंवह रूप दिखायो ।गगन-बेत-ख-ख-व्‍योम-वेद बसु स्‍वाँग दिखाए ।अंत रूप यह मनुष रीझ के हेतु बनाए ।।जो रीझे तो दीजिए लजित रीझ जो चाय ।नाराज भए तो हुकुम करु रे स्‍वाँग फेरि मन लाय ।।
(श्‍लोक)
रत्‍नाकरोऽस्ति सदनं गृहिणी च पद्मा,किं देयमस्ति भवते जगदीश्‍वराय ।राधागृहीतमनसे मनसे च तुभ्‍यं,दत्‍तं मया निजमनस्‍तदिदं गृहाण ।।2।।
(अर्थ)
रत्‍नाकर अर्थात् समुद्र आपका गृह है और लक्ष्‍मी जी आपकी गृहिणी हैं, तब हे जगदीश्‍वर! आप ही बतलाइए कि आप को क्‍या देने योग्‍य बच गया? राधिका जी ने आप का मन हरण कर लिया है, जिसे मैं आपको देता हूँ, उसे ग्रहण कीजिए।
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