ग़ज़ल

पट चाहे तन, पेट चाहत छदन

रहीम · सब कलाम देखें
पट चाहे तन, पेट चाहत छदन, मनचाहत है धन, जेती संपदा सराहिबी।तेरोई कहाय कै ’रहीम’ कहै दीनबंधुआपनी बिपत्ति जाय काके द्वार काहिबी॥पेट भर खायो चाहे, उद्यम बनायो चाहे,कुटुंब जियायो चाहे काढ़ि गुन लाहिबी।जीविका हमारी जो पै औरन के कर डारो,ब्रज के बिहारी तौ तिहारी कहाँ साहिबी॥
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