ग़ज़ल
तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा
बिछड़ा है जो एक बार तो मिलते नहीं देखाइस ज़ख़्म को हमने कभी सिलते नहीं देखा
इस बार जिसे चाट गई धूप की ख़्वाहिशफिर शाख़ पे उस फूल को खिलते नहीं देखा
यक-लख़्त गिरा है तो जड़ें तक निकल आईंजिस पेड़ को आँधी में भी हिलते नहीं देखा
काँटों में घिरे फूल को चूम आयेगी तितलीतितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा
किस तरह मेरी रूह हरी कर गया आख़िरवो ज़हर जिसे जिस्म में खिलते नहीं देखा
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