ग़ज़ल

अब कौन से मौसम से

परवीन शाकिर · सब कलाम देखें
अब कौन से मौसम से कोई आस लगाएबरसात में भी याद जब न उनको हम आए
मिटटी की महक साँस की ख़ुश्बू में उतर करभीगे हुए सब्जे की तराई में बुलाए
दरिया की तरह मौज में आई हुई बरखाज़रदाई हुई रुत को हरा रंग पिलाए
बूँदों की छमाछम से बदन काँप रहा हैऔर मस्त हवा रक़्स की लय तेज़ कर जाए
शाखें हैं तो वो रक़्स में, पत्ते हैं तो रम मेंपानी का नशा है कि दरख्तों को चढ़ जाए
हर लहर के पावों से लिपटने लगे घूँघरूबारिश की हँसी ताल पे पाज़ेब जो छंकाए
अंगूर की बेलों पे उतर आए सितारेरुकती हुई बारिश ने भी क्या रंग दिखाए
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