ग़ज़ल

खुलेगी इस नज़र पे

परवीन शाकिर · सब कलाम देखें
खुलेगी इस नज़र पे चश्म-ए-तर आहिस्ता आहिस्ताकिया जाता है पानी में सफ़र आहिस्ता आहिस्ता
कोई ज़ंजीर फिर वापस वहीं पर ले के आती हैकठिन हो राह तो छुटता है घर आहिस्ता आहिस्ता
बदल देना है रस्ता या कहीं पर बैठ जाना हैकि थकता जा रहा है हमसफ़र आहिस्ता आहिस्ता
ख़लिश के साथ इस दिल से न मेरी जाँ निकल जायेखिंचे तीर-ए-शनासाई मगर आहिस्ता आहिस्ता
हुआ है सरकशी में फूल का अपना ज़ियाँ, देखासो झुकता जा रहा है अब ये सर आहिस्ता आहिस्ता
मेरी शोलामिज़ाजी को वो जंगल कैसे रास आयेहवा भी साँस लेती हो जिधर आहिस्ता आहिस्ता
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh