ग़ज़ल

कू-ब-कू फैल गई बात

परवीन शाकिर · सब कलाम देखें
कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई कीउस ने ख़ुश्बू की तरह मेरी पज़ीराई की
कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस नेबात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की
वो कहीं भी गया लौटा तो मेरे पास आयाबस यही बात है अच्छी मेरे हरजाई की
तेरा पहलू तेरे दिल की तरह आबाद रहेतुझ पे गुज़रे न क़यामत शब-ए-तन्हाई की
उस ने जलती हुई पेशानी पे जो हाथ रखारूह तक आ गई तासीर मसीहाई की
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh