ग़ज़ल

एक मंज़र

परवीन शाकिर · सब कलाम देखें
कच्चा-सा इक मकाँ, कहीं आबादियों से दूरछोटा-सा इक हुजरा, फ़राज़े-मकान परसब्ज़े से झाँकती हुई खपरैल वाली छतदीवार-ए-चोब पर कोई मौसम की सब्ज़ बेलउतरी हुई पहाड़ पर बरसात की वह रातकमरे में लालटेन की हल्की-सी रौशनीवादी में घूमता हुआ इक चश्मे-शरीरखिड़की को चूमता हुआ बारिश का जलतरंगसाँसों में गूँजता हुआ इक अनकही का भेद !
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