ग़ज़ल

चारागर भूल गया हो जैसे

परवीन शाकिर · सब कलाम देखें
चारागर भूल गया हो जैसेअब तो मरना ही दवा हो जैसे
मुझसे बिछुड़ा था वो पहले भी मगरअब के यह ज़ख़्म नया हो जैसे
मेरे माथे पे तेरे प्यार का हाथरूह पर दस्ते-सबा हो जैसे
यूँ बहुत हँस के मिला था लेकिनदिल ही दिल में वो ख़फ़ा हो जैसे
सर छुपाएँ तो बदन खुलता हैज़ीस्त मुफ़लिस की रिदा हो जैसे
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