ग़ज़ल
उलझन
रात भी तन्हाई की पहली दहलीज़ पे हैऔर मेरी जानिब अपने हाथ बढ़ाती हैसोच रही हूंउनको थामूंज़ीना-ज़ीना सन्नाटों के तहख़ानों में उतरूंया अपने कमरे में ठहरूंचांद मेरी खिड़की पर दस्तक देता है
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