ग़ज़ल
इसी में ख़ुश हूँ
इसी में ख़ुश हूँ मेरा दुख कोई तो सहता हैचली चलूँ कि जहाँ तक ये साथ रहता है
ज़मीन-ए-दिल यूँ ही शादाब तो नहीं ऐ दोस्तक़रीब में कोई दरिया ज़रूर बहता है
न जाने कौन सा फ़िक़्रा कहाँ रक़्म हो जायेदिलों का हाल भी अब कौन किस से कहता है
मेरे बदन को नमी खा गई अश्कों कीभरी बहार में जैसे मकान ढहता है
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