ग़ज़ल

अजीब तर्ज़े-मुलाक़ात

परवीन शाकिर · सब कलाम देखें
अजीब तर्ज़-ए-मुलाक़ात अब के बार रहीतुम्हीं थे बदले हुए या मेरी निगाहें थींतुम्हारी नज़रों से लगता था जैसे मेरे बजाएतुम्हारे ओहदे की देनें तुम्हें मुबारक थीं
सो तुमने मेरा स्वागत उसी तरह से कियाजो अफ़सराने-ए-हुकूमत के ऐतक़ाद में हैतक़ल्लुफ़न मेरे नज़दीक आ के बैठ गएफिर एहतराम से मौसम का ज़िक्र छेड़ दिया
कुछ उस के बाद सियासत की बात भी निकलीअदब पर भी दो चार तबसरे फ़रमाएमगर तुमने न हमेशा कि तरह ये पूछाकि वक्त कैसा गुज़रता है तेरा जान-ए-हयात ?
पहर दिन की अज़ीयत में कितनी शिद्दत हैउजाड़ रात की तन्हाई क्या क़यामत हैशबों की सुस्त-रवी का तुझे भी शिकवा हैग़म-ए-फ़िराक़ के क़िस्से निशात-ए-वस्ल का ज़िक्ररवायतें ही सही कोई बात तो करते.....
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