ग़ज़ल

उसी तरह से हर इक ज़ख़्म ख़ुशनुमा देखे

परवीन शाकिर · सब कलाम देखें
उसी तरह से हर इक ज़ख़्म खुशनुमा देखेवो आये तो मुझे अब भी हरा-भरा देखे
गुज़र गए हैं बहुत दिन रिफ़ाक़ते-शब मेंइक उम्र हो गई चेहरा वो चाँद-सा देखे
मेरे सुकूत से जिसको गिले रहे क्या-क्याबिछड़ते वक़्त उन आंखों का बोलना देखे
तेरे सिवा भी कई रंग ख़ुशनज़र थे मगरजो तुझको देख चुका हो वो और क्या देखे
बस एक रेत का ज़र्रा बचा था आँखों मेंअभी तलक जो मुसाफ़िर का रास्ता देखे
उसी से पूछे कोई दश्त की रफ़ाकत जोजब आँख खोले पहाड़ों का सिलसिला देखे
तुझे अज़ीज़ था और मैंने उसको जीत लियामेरी तरफ़ भी तो इक पल ख़ुदा देखे
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