ग़ज़ल
उसके मसीहा के लिए
अजनबी!कभी ज़िन्दगी में अगर तू अकेला होऔर दर्द हद से गुज़र जाएआँखें तेरीबात-बेबात रो रो पड़ेंतब कोई अजनबीतेरी तन्हाई के चाँद का नर्म हाला बनेतेरी क़ामत का साया बनेतेरे ज़ख़्मों पे मरहम रखेतेरी पलकों से शबनम चुनेतेरे दुख का मसीहा बने
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