ग़ज़ल
अक़्स-ए-ख़ुशबू हूँ
अक़्स-ए-ख़ुशबू हूँ, बिखरने से न रोके कोईऔर बिखर जाऊँ तो, मुझ को न समेटे कोई
काँप उठती हूँ मैं सोच कर तन्हाई मेंमेरे चेहरे पर तेरा नाम न पढ़ ले कोई
जिस तरह ख़्वाब हो गए मेरे रेज़ा-रेज़ाइस तरह से, कभी टूट कर, बिखरे कोई
अब तो इस राह से वो शख़्स गुज़रता भी नहींअब किस उम्मीद पे दरवाज़े से झाँके कोई
कोई आहट, कोई आवाज़, कोई छाप नहींदिल की गलियाँ बड़ी सुनसान है आए कोई
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