ग़ज़ल
कमाल-ए-ज़ब्त को ख़ुद भी तो आज़माऊँगी
कमाल-ए-ज़ब्त को ख़ुद भी तो आज़माऊँगीमैं अपने हाथ से उस की दुल्हन सजाऊँगी
सुपुर्द कर के उसे चांदनी के हाथोंमैं अपने घर के अंधेरों को लौट आऊँगी
बदन के कर्ब को वो भी समझ न पायेगामैं दिल में रोऊँगी आँखों में मुस्कुराऊँगी
वो क्या गया के रफ़ाक़त के सारे लुत्फ़ गयेमैं किस से रूठ सकूँगी किसे मनाऊँगी
वो इक रिश्ता-ए-बेनाम भी नहीं लेकिनमैं अब भी उस के इशारों पे सर झुकाऊँगी
बिछा दिया था गुलाबों के साथ अपना वजूदवो सो के उठे तो ख़्वाबों की राख उठाऊँगी
अब उस का फ़न तो किसी और से मनसूब हुआमैं किस की नज़्म अकेले में गुन्गुनाऊँगी[मनसूब= जुडा हुआ]
जवज़ ढूंढ रहा था नई मुहब्बत कावो कह रहा था के मैं उस को भूल जाऊँगी[जवज़=कारण]
सम'अतों में घने जंगलों की साँसें हैंमैं अब कभी तेरी आवाज़ सुन न पाऊँगी
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