ग़ज़ल
सोसनी दुकूलनि दुराये रूप रोसनी है
सोसनी दुकूलनि दुराये रूप रोसनी है ,बूटेदार घाँघरी की घूमनि घुमाइ कै ।कहैं पदमाकर त्यों उन्नत उरोजन पै,तंग अंगिया है तनी तननि तनाइ कै ।छज्जन की छाँह छवि छैल के मिले के हेतु.छाजति छपा मैँ योँ छबीली छबि छाइ कै ।ह्वै रही खरी है छरी फूलकी छरी सी छिपि,साँकरी गली मे फूल पाँखुरी बिछाइ कै ।
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