ग़ज़ल
अँचल के ऎँचे चल करती दॄगँचल को
अँचल के ऎँचे चल करती दॄगँचल को ,चंचला ते चँचल चलै न भजि द्वारे को ।कहै पदमाकर परै सी चौँक चुम्बन मे,छलनि छपावै कुच कुभँनि किनारे को ।छाती के छुवै पै परै राती सी रिसाय ,गलबाहीँ किये करै नाहीँ नाहीँ पै उचारे को ।ही करति सीतल तमासे तुंग ती करति ,सी करति रति मे बसी करति प्यारे को ।
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh