ग़ज़ल
कबहूं फिर पांव न देहौं लला, भजि जैहौं तहां जहां सूधी सहौ
कबहूं फिर पांव न देहौं लला, भजि जैहौं तहां जहां सूधी सहौ ।पदमाकर देहरी द्वार किवार लगे ललचैहौ न ऎसी चहौ ।बहियाँ की कहा छहियां न कहूं छुवे पावहुगे लला लाज लहौ ।चित चाहे कहौ न कहौ बतियाँ, उतही रहौ हा हा हमैं न गहौ ।
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