ग़ज़ल

दूरि ही ते देखति दसा मैँ वा वियोगिनि की

पद्माकर · सब कलाम देखें
दूरि ही ते देखति दसा मैँ वा वियोगिनि की ,आई दौरि भाजि ह्यां न लाज मढि आवैगी ।कहै पदमाकर सुनौ हो घनस्याम वाहि ,चेतत कहूँ जो एक आह कढि आवैगी ।सर सरितान को न सूखत लगैगी बेर ,एती कछू जुलसिन ज्वाला बढि आवैगी ।बाकी बिरहागि की कहौँ मैं कहा बात ,मेरे गातहिं छुवौ तो तुम्हें ताप चढि आवैगी ।
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