ग़ज़ल
प्रिय यामिनी जागी
(प्रिय) यामिनी जागी।अलस पंकज-दृग अरुण-मुखतरुण-अनुरागी।
खुले केश अशेष शोभा भर रहे,पृष्ठ-ग्रीवा-बाहु-उर पर तर रहे,बादलों में घिर अपर दिनकर रहे,ज्योति की तन्वी, तड़ित-द्युति ने क्षमा माँगी।
हेर उर-पट फेर मुख के बाल,लख चतुर्दिक चली मन्द मराल,गेह में प्रिय-नेह की जय-माल,वासना की मुक्ति मुक्तात्याग में तागी।
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