ग़ज़ल

रानी और कानी

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' · सब कलाम देखें
माँ उसको कहती है रानीआदर से, जैसा है नाम;लेकिन उसका उल्टा रूप,चेचक के दाग़, काली, नाक-चिपटी,गंजा-सर, एक आँख कानी ।
रानी अब हो गई सयानी,बीनती है, काँड़ती है, कूटती है, पीसती है,डलियों के सीले अपने रूखे हाथों मीसती है,घर बुहारती है, करकट फेंकती है,और घड़ों भरती है पानी;फिर भी माँ का दिल बैठा रहा,एक चोर घर में पैठा रहा,सोचती रहती है दिन-रात,कानी की शादी की बात,मन मसोसकर वह रहती हैजब पड़ोस की कोई कहती है —
“औरत की जात रानी,ब्याह भला कैसे होकानी जो है वह !”
सुनकर कानी का दिल हिल गया,काँपें कुल अंग,दाईं आँख सेआँसू भी बह चले माँ के दुख से,लेकिन वह बाईं आँख कानीज्यों-की-त्यों रह गई रखती निगरानी ।
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