ग़ज़ल
अभी न होगा मेरा अन्त
अभी न होगा मेरा अन्तअभी-अभी ही तो आया हैमेरे वन में मृदुल वसन्त-अभी न होगा मेरा अन्त
हरे-हरे ये पात,डालियाँ, कलियाँ कोमल गात!
मैं ही अपना स्वप्न-मृदुल-करफेरूँगा निद्रित कलियों परजगा एक प्रत्यूष मनोहर
पुष्प-पुष्प से तन्द्रालस लालसा खींच लूँगा मैं,अपने नवजीवन का अमृत सहर्ष सींच दूँगा मैं,
द्वार दिखा दूँगा फिर उनकोहै मेरे वे जहाँ अनन्त-अभी न होगा मेरा अन्त।
मेरे जीवन का यह है जब प्रथम चरण,
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